जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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01 December 2008

ब्लागिंग विदाउट परपज़ !

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नेट पर बस इधर उधर टहल रहा हूँ । लोगों ने आनन फ़ानन मुंबई हादसे पर अपनी हाज़िरी लगा दी है । कुछेक जन तो बहुत ही गंभीर रहे हैं, कुछेक डाक्टर सेक्योरिटी को मारने पीटने के तेवर में दिखे । डाक्टर तो आपने ही चुना होगा । पर, मैं क्या लिखूँ, यह सोचता हुआ अपने इमेज़ एडीटर से खिलवाड़ कर रहा था, मन में चल विचारों को संयत भाषा में बाँधने की उठापटक चल रही है, सहसा कहीं छिपे किसी अदृश्य विचार ने यह इमेज़ बनवा दिया

    क्या आप...अमर       

कोई एकमत न हो पाने पर दूसरी एक और मीटिंग रखने का मौका हाथ में रहेगा
दो मिनट के मौन में, आप शाम को घर ले जाने वाली शाक-भाजी का निर्णय तो ले ही सकते हैं ?

तो.. आइये आज हम देश की सुरक्षा व्यवस्था पर अपनी मीटिंग जारी रखें

8 टिप्पणी:

makrand का कहना है

bahut umda

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

परपजलेस तो नहीं ही है।

PD का कहना है

meeting ke alava aur kya rakh sakte hain? jo maarne aaye the vo phir aayenge, ham yoo hi meeting ke chakkar me rahenge.. kabhi uchh-stariy baithak hogi to kabhi nimn stariy .. magar hogi bas meeting..

Anil Pusadkar का कहना है

सटीक।

डॉ .अनुराग का कहना है

क्या कहे अब भी नही चेता देश तो आगे ऐसी मीटिंग का भी मौका नही मिलेगा

विष्णु बैरागी का कहना है

निठल्‍ला नहीं, यह तो कामकाजी चिन्‍तन है ।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" का कहना है

बहुत ही उम्दा

समयचक्र - महेद्र मिश्रा का कहना है

charcha karna ek majaboori ban gai hai ji

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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