जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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07 December 2008

सनद रहे कि यह नकल है..

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अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ?
यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे..
इस पोस्ट के मूल लेखक को... नहीं पहचाना ?  कोई बात नहीं., फिर तो..
यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये                                                            और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें
art-thief_e0मैं नक्काल - अमर
ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया ।
ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे।
ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें ।
पहला - ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ*
दूसरा - उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( भले) इधर पबलिक दे लो* लग जाण।
तीसरा - ओ पैंचो मिडिया वाले वी अपणी मां *** पै ने । एक नू हत्थ नाल खून रिसदा पिया वे ते माचो मु विच्च माइक पा के दस्सदे पये ने - ये देखो कितना खून निकल रहा है - ओ मांचो कून (खून) नहीं निकलेगा ते के चाशनी निकलेगी....... मां दे दीने।
पहला- ओ लौंडा( पकडा गया एक आतंकी) टुटण लगिया वे, ओन्नु चंगी तरह कुटणा चहीदा, पैणचो हुणे टंग नाल बाल नहीं निकलिया, माचो अटैक करन चलिया सी, मां दे दीने नु पुन्न के रखणा चहिदा ए ऐसे लोकां नुं।
दूसरा - ओ बीबीसी वाले आतंकवादीयां नुं टेररिस्ट नहीं बोलदे.....उन्ना नुं गनमैन बोलदे ने ......इन्ना दे तराह ( भारतीय मीडिया की तरह) ढाम-ढूम मूजिक-व्यूजिक ला के चिल्ला के नई बोलदे - आतंकवादी यहाँ अपनी मां चु* रहा है।
( तीनों ने जोरदार ठहाका लगाया)
पहला - ओ तैनु पता ऐ I B वालियां ने उन्नी तरीक नु ( उन्नीस तारीख को) एन्ना नु बोलिया सी कि तुहाडे ताजमहल होटल विच खतरा हैगा। पर ऐ मंत्रीयां नु मां *** नाल फुरसत मिले तां ना।
तीसरा - इस देश दा हुण की होउगा, पता नी यार।
दूसरा - ओ विलासराव, लैके गिया सी रामगोपाल वरमा नुं ......ऐ के तमाशा विखाण वास्ते लै गिया सी के.......नाल अपणे मुंडे नुं वी लै के गिया सी के नां है उसदा.....?
पहला - रीतेश देशमुख....।
दूसरा - हां....रितेश.....के लौड ( जरूरत) पै गई सी ओन्नु लै के जाण दी। हुण के अपणें मुंडे वास्ते लोकेशन वेखण गिया सी कि देख लै बेटा - तैनु इधरे शुटिंग करनी है।
तीसरा - देश दा तमाशा बना के रख दित्ता है होर कुछ नहीं।
अभी ये बातें चल रही थीं कि उन लोगों का ही कोई परिचित एक मोना पंजाबी अपने साथ एक बैग लेकर वहीं से गुजर रहा था। उसे आवाज देकर बुलाते हुए एक ने कहा -
ओए.....बैग वैग लै के कित्थे कोई अटैक उटैक करने जा रिहा है के।
सत श्री अकाल जी।
सत श्री अकाल ( तीनों ने सम्मिलित जवाब दिया)
पास आ जाने पर उस युवक से उन लोगों की बातचीत चल पडी।
कित्थे जा रिहा है।
ओ कल मनजीते दी बर्थडे पार्टी है, उस लई कुछ सामान-सुमून खरीदीया है।
पहला - ओ इधर अटैक-शूटैक हो रिया वे .....ते तुस्सी पार्टी शार्टी कर रहे हो।
( एक हल्की हंसी इन चारों में फैल गई)
उदरों ही आ रिहा वां ( उधर से ही आ रहा हूँ) , लोकी सडकां ते आ गये ने बैनर-शुनर लै के ( लोग सडक पर आ गये हैं, बैनर वैनर लेके )।
सडक ते आणा ही है यार, बंबे दी पब्लिक चूतिया थोडे है.....सैण दी वी लीमट हुंदी ए ( सहने की भी लिमीट होती है)।
यह बातचीत और लंबी चली होगी। लेकिन इधर मैं अपने मित्र के काम निपट जाने पर दुकान से निकल आया....... जब कि इच्छा थी की अभी और इन लोगों की बातचीत सुनूं।
_____________________________________________________________पहचान तो नहीं लिया ? मैं क्यॊ बताऊँ कि यह सतीश पंचम की पोस्ट है, या मेरी ? अब कुछेक पल को कल्पना करें, कि यह पोस्ट मई 2007 में लिखी गयी होती तो ? क्या पता, लेखक अपना पोस्ट मैटर कहाँ से खोद कर लाया है ? आप तो पब्लिक की शार्ट-मेमोरी के मुरीद हैं, न ? शर्मा-शर्मी में भी, कोई शर्मदार एक टिप्पणी तो डाल ही जायेगा, नीचे वाले चौकोर कमेन्ट-कटोरे में ! चलिये मान लेते हैं कि यह सतीश पंचम जी की ही पोस्ट है, तो मैं उनकी लोकप्रियता में श्री-वृद्धि ही तो कर रहा हूँ ?  यह बौद्धिक संपदा पर अतिक्रमण कैसे माना जाये, आप ही बोलिये ?

15 टिप्पणी:

सतीश पंचम का कहना है

हा हा .... क्या करूँ..... अलीगढ जाने पर मेरे लिये प्रतिबंध लग गया है :) गोदरेज पास फटकने नहीं दे रहा और बगल का पनवाडी बोली-ठोली बोलता है कि.....आये हैं बडे ताले वाले :):)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

चाहे रचना पंचम की हो, पोस्ट तो आप की ही है। वह भी न्यूनतम श्रम के साथ की गई।

अनूप शुक्ल का कहना है

ई त हम बांच चुके हैं। फ़िर से पढ़ लिये।

विष्णु बैरागी का कहना है

प्रस्‍तुति का सन्‍दर्भ तो समझ में नहीं आया पर पोस्‍ट का आनन्‍द खूब आया ।
हां, पोस्‍ट तो आपकी ही है जैसा कि द्विवेदीजी ने कहा ।

डा० अमर कुमार का कहना है

@ भाई सतीश पंचम जी,

अब कुछ कुछ समझ आ रहा है, भाई जी ?

अब तक के 50% आगंतुक इसे मेरी पोस्ट होने का श्रेय दे रहे हैं,
बैरागी जी, टिप्पणी ठोंक गये.. पूरी पोस्ट पढ़ने से वैराग्य ले लिया हो, जैसे ?
पोस्ट में तो संदर्भ स्पष्ट दिया गया है !

अब माइक्रोसाफ़्ट प्रमुख बिल गेट्स से पाइरेसी पर हुई मेरे ई-मेलाचार का विवरण अगली किसी पोस्ट में...

विनय का कहना है

हम क्या लिखें या जो ऊपर कहा गया वही पुन: दोहरा दें। बहुत बढ़िया आनन्द आया, घर में कोई लड़का नहीं आया, मन को आनन्द आया!

परमजीत बाली का कहना है

पोस्ट जिसकी भी हो लेकिन बहुत अच्छी लगी।आभार।

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर का कहना है

post to aapki hi hai!!!!!!!

कविता वाचक्नवी का कहना है

???????????????????

.... क्या कहिए!

dinesh का कहना है

बहुत रोचक बात चीत है
ये पहले, दूसरे और तीसरे 20 हजार करोड़ के बेल आउट पैकेज पर क्या सोचते है? इसे रिकार्ड करके सतीश पंचम लायेंगे या आप?

डा० अमर कुमार का कहना है

@ कविता वाचक्नवी
?????? .... क्या कहिये !

बस, यही कहा जा सकता है, कि..
यह ताला-प्रकरण पर एक ठोस ठिठोली है और क्या ?

डॉ .अनुराग का कहना है

गुरुवर हमने असल भी पढ़ी थी ओर अब नकल भी थाम ली है.....बाकी टिप्पणी शाम को .असल दुबारा से पढने के बाद ...

Udan Tashtari का कहना है

ओरिजिनल सतीश भाई के यहाँ पढ़ी भई है. आपके यहाँ इसे आपकी पोस्ट पर सतीश बाबू का आलेख मान कर फिर पढ़ लिए. त आभार आपका ही कह देते हैं.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी का कहना है

डॉक्टर साहब, आपतो कविता जी को छेड़ रहे हैं शायद। इसे ही शायद लंठई कहते हैं। खैर... इस पोस्ट को यहाँ दुबारा पढ़वाने का आभार। निठल्लेपन का भी अपना ही मजा है। :)

ई-गुरु राजीव का कहना है

खैर रचना तो मेरे लिए नई ही है क्योंकि पहली बार जो पढ़ रहा हूँ. :)

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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