जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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12 January 2009

अथ क़ाफ़िर कथा

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शिवभाई की पोस्ट पर कल देखने को मिला कि, हड़ताली ब्लागरों में मैं भी शहीद हो गया हूँ ! नहीं भाई, मेरा हड़ताल उड़ताल नहीं चल रहा है..तेल वाले हड़ताल पर थे.. या हड़ताल वाले गये तेल लेने ! आप तो दिन तक गिन ले गये…  कि, 16 दिन से गायब हूँ । ‘ काना देखे जिऊ जराये.. काना बिना रहा न जायBatting Eyelashes.. ’ , मैं तो यहीं हूँ, भाई ! हाल में एनिमेटेड इमेज़ बनाने का व्यूह तोड़ा है, सो उसी के संग प्रयोग चल रहा है ! आख़िर कहीं तो टाइम खोटी करना है, न ?  पोस्ट तो दूर,  शुद्ध मन से की टिप्पणी पर ही,  न जाने कौन उखड़ जाये ?  सो, वह भी नाप-तौल कर ही होती है !  स्व. मेज़र उन्नीकृष्णन के एक बहुचर्चित मुद्दे पर मेरा अनुसंधान चल रहा है, पढ़ लेना ! अब इतनी ज़ल्दी नई पोस्ट कहाँ से टीपूँ ? लो एक पुरानी रिसाइकिल की हुई पोस्ट देखो, शायद ठीक लगे ? दरअसल आज कविता जी की चिट्ठाचर्चा पर भाषाओं के बहुआयामी प्रयोग ने मुझसे मलेच्छों की भाषा में टिप्पणी करवा दी ! लाहौल बिला कूवत.. तौबा तौबा जैसी प्रतिटिप्पणी अब तक तो नहीं आयी, पर कुछेक अहं-सहलाऊ प्रशंसकों ने लसंसे भेज कर अपनी जुगुप्सा ज़ाहिर की.. लिहाज़ा आज यही पोस्ट मौज़ूँ लग रही है ! क्यों लसंसे नहीं समझे ?  अरे हिन्दी वालों, अपुन राबचिक हिन्दी  तईय्यार कर रैले हैं  ! लसंसे बोले तो लघु संदेश सेवा यानि एस.एम.एस... अब तो खुश ?  लो पोस्ट बाँचों..
अथ क़ाफ़िर कथा
अपने एम०बी०बी०एस के दौरान हास्टल में मैंने पाया कि बाँग्लादेश की मुक्ति के बाद हमारे चंद मुस्लमीन भाईयों का मिज़ाज़ ही कुछ बदला हुआ है । ज़ल्द ब ज़ल्द नज़रें मिला कर बात तक न करते थे । बड़ी क़ोफ़्त होती थी, क्यों भाई ? समर्पण तो ज़नरल नियाज़ी ने किया है, पाकिस्तान की फ़ौज़ें हारी हैं । भला आपकी नज़रें नीची क्यों ?  मेरे मित्र व रूम पार्टनर अशोक चौहान मुझपर खीझा करते थे, " यार, तुम बलवा करवाओगे ", बेनाझाबर, चुन्नीगंज़ वगैरह ज़्यादा दूर भी नहीं था । फिर अचानक यह दिखने लगा कि उनमें से चंद शख़्शियत दाढ़ी रखने लगी, हैलेट की ड्यूटी से फ़ारिग हो, हास्टल आते ही ऎप्रन वगैरह फेंक फाँक अलीगढ़ी पोशाक पहन कर टहला करते थे, और सिर पर गोल टोपी ! एक-ब-एक कौमी निशानियाँ याद आने का सबब आप  बाद में  समझते रहें, फिर मुझे  भी बतलाइयेगा !  अभी तो मैं आगे बढ़ता हूँ …
मेरे मित्रों में इक़बाल अहमद जैसे भी थे, जो हर मंगलवार को मेरे संग एच०बी०टी०आई के पीछे वाले  नवाबगंज़ हनुमान मंदिर भी जाया करते थे । बाकायदा माथा टेकते थे, हँस कर कहते कि , यार अपने पुरखों ने जो ब्लंडर मिस्टेक किया उसकी माफ़ी माँग लेता हूँ । मेरे व्रत तोड़ते ही एक सिगरेट सुलगा मेरे संग शेयर करते थे, तब 60 पैसे डिब्बी वाली कैप्सटन अकेले अफ़ोर्ड कर पाना कठिन होता था । उसके आधे दाम में चारमीनार आया करती थी, हम लोगों के अध्ययन के घंटों की अनिवार्यता थी, वह तो ! एक एक कश के लिये छीन-झपट का मज़ा ही और है, यह लक्ज़री में शुमार नहीं की जा सकती ।
दूसरी तरफ़ इमरान मोईन जैसे शख़्स भी थे, जो इक़बाल अहमद सरीखों पर लानतें भेजा करते । इमरान मोईनुल यानि कि एक कृशकाय ढाँचें पर टँगा हुआ छिला अंडा, जिससे लटकती हुई एक अदद बिखरे हुये तिनकों सी कूँचीनुमा दाढ़ी , पंखे की हवा में दाँयें बाँयें डोला करती । बातें करते हुये वह बड़े नाज़ से उसे सहलाते रहते । एक दफ़ा किसी बात पर उनकी रज़ामंदी वास्ते मैंने लाड़ से उनकी दाढ़ी सहला दी । ऊई अल्लाह, यह तो लेने के देने पड़ गये । मियाँजी पाज़ामें से बाहर थे, गुस्से से थरथर काँपते हुये बोले, ' अमर , हमसे दोस्ती करो, हमारी दाढ़ी से नहीं । आइंदा यह हरकत की तो निहायत बुरा होगा ।'  एकाएक मैं कुछ समझा ही नहीं, बस इतना समझ में आ रहा था कि इनको पटक दूँ फिर पूछूँ , ' बोल, कहाँ  से निहायत और कहाँ  से बुरा कर लेगा ?  चल, दोनों अलग अलग करके बता कि क्या कर लेगा ? '  लेकिन जैसा कि शरीफ़ आदमी करते हैं, यह सब मैं मन ही मन बोल रहा था । उनसे तो ज़ाहिराना इतना ही पूछा, यार तेरी दाढ़ी की क़लफ़ क्रीज़ तक डिस्टर्ब नहीं हुई, फिर तू क्यों इतना डिस्टर्ब हो रहा है ? ज़नाब चश्मे नूर फिर बिदक गये, 'तुम साले क्या जानो , दाढ़ी का ताल्लुक़ हमारे  ईमान से है ! इस पर हाथ मत लगाया करो, समझे कि नहीं ? अब मुझे भी 100% असली वाला गुस्सा आ गया, " चलो घुस्सो ! अग़र दाढ़ी में ही तेरा ईमान है तो बैठ कर अपना xx सहलाते रहो । " और उनके इनसे-उनसे भविष्य में संभोग कर लेने की कस्में खाता हुआ , मैं वहाँ से पलट लिया । वह पीछे से चिल्ला रहे थे, " सालों तुम भी तो चुटइया रखते हो और अपने धरम को उसमें बाँधे बाँधे तुम्हारे पंडे घूमा करते हैं, जाकर उसको सहलाओ, फिर मेरी सहलाना । "  हमारे इक़बाल भाई , जो  स्वयं ही सफ़ाचट्ट महाराज थे, मेरे इस डायलाग के पब्लिसिटी मॆं जी जान से जुट गये और लगभग सफ़ल रहे । ख़ुदा उनको उम्रदराज़ करे… 
पोस्ट लंबी हो रही है, चलते चलते इसी संदर्भ की एक अन्य घटना का ज़िक्र करने की हाज़त हो रही है । तो, वह भी कर ही लेने दीजिये, कल हो ना हो ! दसेक वर्ष पहले शाम को मेरे क्लिनिक में एक सज्जन आये । लहीम-शहीम कद्दावर शख़्सियत के मालिक , वह बेचैनी से बाहर टहल रहे थे यह तो काँच के पार दिख रहा था, लेकिन बरबस मेरा ध्यान खींच रहे थे । उनसे ज़्यादा मैं उतावला होने लगा कि इनकी बारी ज़ल्द आये, देखूँ तो यह कौन है ? खैर, वह दाख़िल हुये, बड़े अदब से सलाम किया, फिर अपना तआर्रूफ़ दिया कि मुझे नक़वी साहब ने भेजा है और मुझे यह-वह तक़लीफ़ है । मेरे मुआइने के बाद, वह फिर मुख़ातिब हुये , " डाक्टर साहिब, दवाइयाँ कैसे लेनी हैं, यह निशान बना दीजियेगा । "  मैं हिंदी में ही अपने निर्देश लिखता हूँ, इसलिये थोड़े ग़ुमान से बोला अंग्रेज़ी-हिंदी जिसमें चाहें लिख दूँगा । वह फ़ौरन चौंक पड़े, प्रतिवाद में बोले कि उनको हिंदी अंग्रेज़ी नहीं आती लिहाज़ा निशान के ज़रिये ही समझ लेंगे । अब मैं चौंका, क्या चक्कर है ? अच्छा भला पढ़ा लिखा लगता है, सन्निपात के लक्षण भी नहीं दिखते फिर भी कहता है कि पढ़ना नहीं जानता ! अलबत्ता वह मेरे चेहरे को पढ़ ले गये । थोड़ी माफ़ी माँगने के अंदाज़ में बोले, "मैं दरअसल बिब्बो की शादी में कराची से आया हूँ, और सिंधी ( मुल्तानी-पश्तो लिपि का मिश्रण) व उर्दू के अलावा कुछ और नहीं पढ़ पाते । उनकी परेशानी समझ मैंने बड़ी सहज़ता से लिखना शुरु किया ....
 ايک ايک دن ٔم تين بار ک کپسول روذ رات  यानि एक एक दिन में तीन बार, एक कैप्सूल रोज़ रात
लो,जी ! वह फिर चौंके, थोड़े अविश्वास से कुछ पल मुझे देखते रहे । मेरे माथे पर एक छोटा सा लाल टीका, बगल में माँ दुर्गा कि मूर्ति...कुछ संकोच से पूछा, ' आप तो हिन्दू हैं ? ' हाँ भाई, बेशक ! बेचारे हकला पड़े, " तो..तो, फिर यह उर्दू आपके ख़ुशख़त में कैसे ? " अच्छा मौका है, चलो एक सिक्सर ठोक दिया जाये । मैंने कहा , ' मैं क्यों नहीं लिख सकता ? क्या उर्दू आपकी ही मिल्कियत है ? उर्दू भी तो आप इसी मुल्क़ से ले गये हैं ! '  एकदम से खड़बड़ा गये श्रीमान जी," नहीं नहीं हम लोगों को वहाँ कुछ और ही बताया जाता है । "  मैदान फ़ेवर कर रही है, सिक्सर ठोंक दो,  अमर कुमार ! अतः मैंने हँस कर कहा, ' यही न कि क़ाफ़ (    ک  )  से क़ाफ़िर ( کافر     ) , जिसमें धोती कुर्ता में एक आदमी दिखाया गया है, और हे ( ح   ) से हिंदू (    حندو   ) जिसमें एक सिर घुटे चुटियाधारी पंडितजी तिलक लगाये हुये अलिफ़ अव्वल की क़िताबों में बिसूर रहे हैं । ' एकदम से खिसिया गये, चंद मिनट पहले उनका फटता हुआ माथा जैसे फ़िस्स हो गया , " यह तो अब सारी दुनिया जानती है कि हमारे हुक़्मरानों ने पाकिस्तान को क्या दिया और दे रहे हैं । वापस जाने से पहले एक बार आपसे फिर मिलूँगा, अल्लाह हाफ़िज़ ! "  वह मिलने तो नहीं आये, लेकिन कुछ वर्षों तक ख़तों का आना जारी रहा जिसके ज़रिये उन्होंने इत्तिल्ला दी कि मेरा पर्चा उन्होंने फ़्रेम करवा कर अपने होटेल में लगवा रखा है और वह उनके लिये कितना बेशकीमती है । एक पल को हर आने वाला उसके सामने ठिठक कर एक नज़र देखता ज़रूर है । यह किस्सा मैंने कोई आत्मप्रशस्ति में नहीं लिखा है यह तो , केवल एक झलक  देता है कि लोचा कहाँ पर है !  क्या हम यह नहीं जानते कि भाषा का प्रयोग इंसानों को बाँटने का प्राचीनतम ज़रिया  है ?
अब जरा मेरा टाइमखोटी करने का परिणाम भी बताते जाइये
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14 टिप्पणी:

राज भाटिय़ा का कहना है

अरे वाह अमर साहब जी यह हुयी ना बात,वेसे यह सच है कि पकिस्तान मै इन लोगो को बचपन से ही भारत के विरुध पढाया जाता है, यहा मेरे दोस्तो मे पाकिस्तानी भी है, यह सब बाते जो आप ने लिखी है वो बताते है, ओर भी पता नही क्या अनाप साअप,
लेकिन जो पकिस्तानी एक बार एक भारतीया से मिल लेता है, वो खुद ही बदल जाता है, अगर वो कट्टर ना हुआ तो ,
धन्यवाद,
ओर शुभ दिन

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

ये पोस्ट दुबारा पढ़ कर फख्र का अहसास हुआ। बहुत कोशिश कर के भी ये स्क्रिप्ट हम नहीं सीख पाए पर उस का मलाल भी बहुत है। काश जिन काजी साहब से संस्कृत पढ़ी थी उन से कुछ उर्दू भी सीख ली होती।

Udan Tashtari का कहना है

यह री ठेल भी मस्त रही.

विनय का कहना है

जी साहब बिल्कुल ठीक फ़रमा रहे हैं, हम भारतीय अगर सहनशील और संयमी नहीं होते तो विविधता में एकता जैसा वाक्य आज न होता!

Shiv Kumar Mishra का कहना है

शानदार!

Gyan Dutt Pandey का कहना है

बहुत अच्छी पोस्ट। और याद रखने योग्य।
धन्यवाद।

डॉ .अनुराग का कहना है

गुरुदेव आपके चरण कहाँ है ...?हमें तो दो साल पहले किसी कांफ्रेंस के सिलसिले में पाकिस्तान जाने का ऑफर मिला था .ससुरा कोई हम उम्र यार दोस्त साथ चलने को तैयार नही हुआ ...ओर बुजुर्गो के साथ अपनी जाने की हिम्मत नही हुई....वरना आपका पर्चा वहां देख हम भी छाती चौडी करके लौट आते ....

आपका लिखने का स्टाइल देख कर लगता है .डाक्टरी छोड़कर कही किसी किताब में साप्ताहिक व्यंग्य लेखन शुरू कर दे तो एक घर बैठे रोयल्टी के मजे भी लूट सकते है ओर कई बड़े लेखको को झटके भी....
खैर हमारे भी कई यार रहे पर मजहब पर कॉलेज में कोई डिसकसन नही रहा...इस मुद्दे पे सब खामोश हो जाते थे.....केवल दो लोग थे जिनसे हम सूखा बरगद (मंजूर एहतेशाम ) ओर शायर इकबाल पर खूब भिडे......ओर शाहबानो केस पर खूब बहस हुई.....पर दोस्ती जिंदा रही.....वो भी नॉन मेडिको थे ...वक़्त ने सब बदल दिया है..अब .मजहब आदमी से ऊपर हो गया है...ओर टोलेरेंस बिल्कुल जीरो हो गयी है ....

ताऊ रामपुरिया का कहना है

यह पोस्ट मैं तो प्रथम बार ही पढ रहा हूं, लाजवाब व्यंग के साथ आपने सामयीक विषय पर जो कि हमेशा ही सामयिक रहता है, पर प्रकाश डाला है. इस भाषा शैली मे आप ही लिख सकते हैं. मुझे पढकर बडा आनन्द आया.

वैसे गुरुदेव मुझे नही लगता कि ये मसला कुछ हल होने वाला है. हम तो पैदा हुये जबसे अब तक ऐसे ही देख सुन रहे हैं.

रामराम.

अभिषेक ओझा का कहना है

ये हुई न पोस्ट. पहले तो हम यही जान कर खुश हो लिए थे की आप भी कानपुर के ही पढ़े हुए हैं...
आगे उर्दू वाला वाकया तो वाकई याद रखने के काबिल है.

Arvind Mishra का कहना है

वाह लाजवाब -आप भी गजबे हैं ! लाम के मानिंद हैं गेसू मेरे घनशयाम के की याद होआयी !

Zakir Ali Rajnish (TSALIIM) का कहना है

आपकी रोचक पोस्‍टों में से एक है, इसी बहाने बहुत कुछ जानने को मिला।

kuhasa का कहना है

आपकी लाजवाब शैली के क्या कहने !
वैसे सुनने में आया है कि खालिस उर्दू वाली जुबां आजकल कठमुल्लों को रास नही आ रही है पकिस्तान में खुदा हाफिज़ में खुदा को अल्लाह रिप्लेस कर रहे हैं.
उर्दू हिन्दुस्तान में पैदा हुई है और हमारे अवध में तो बड़ी पॉपुलर है . आजकल तो अट्ठारह -बीस साला आधुनिकता से सने और रॉक म्यूजिक वाले कई लड़के हमसे पूछा करते हैं कि भैय्या उर्दू कैसे सीखें
क्यों सीखना चाहते हो पूछने पर कहते हैं कि उर्दू पोएट्री समझना है
हम ये नही पूछते कि उर्दू पोएट्री क्यों सीखना समझना है आख़िर छोटे हैं
हम जानते हैं आख़िर उर्दू तो मुहब्बत की जुबान है बिना उर्दू के भी कहीं इश्क होता है!

poemsnpuja का कहना है

ऐसा एक बार हमारे साथ भी हुआ था, १२थ में बड़े शौक़ से उर्दू सीखी थी, नया नया जोश था एक बार ऐसे ही क्लास में बैठी हुयी थी तो उर्दू में कुछ लिखने लगी...एक classmate बड़ी हडबडा गई, तुम पूजा हो न? तुम तो हिंदू हो...मुझे एक सेकंड तो कुछ समझ नहीं आया...कि पूजा नाम होने और हिंदू होने का जिक्र क्यों आ रहा है, फ़िर मुझे ध्यान आया की मैं उर्दू में लिख रही हूँ. ऐसा कई बार और हुआ है, जाने क्यों लोग भाषा को धर्म से जोड़ कर देखते हैं.

राज भाटिय़ा का कहना है

अमर जी ऊर्दू तो शायद हम मै से सभी बोलते होगे, कुछ साल पहले मेरे जिगर दोस्त की मोत एक कार ऎक्सीडेंट मे हो गई, जो पाकिस्तान से था, ओर मुसलमान भी था, लेकिन हम ने कभी भी धर्म के बारे मै नही सोचा था, बस दोस्त थे.
जब वो गुजरा तो सब से ज्यादा दुख मुझे हुआं, शायद भाई के गुजरने पर भी इतना दुख ना होता, जब उसे दफ़नाने के लिये बाकी पाकिस्तानी ले कर गये तो , यह मुसलमान आखरी नमाज अदा करते है, जब उन्होने बोला की जिन्होने भी आखरी नमाज अदा करनी हो तो आ जाये, ओर मै भी वहां चला गया, जब कि मुझे नमाज नही आती, कई लोगो ने ऎतराज भी किया, लेकिन काफ़ी लोगो मेरा साथ दिया ओर कहा की यही तो उस का भाई है, तो जनाब हम ने उस दोस्त के लिये नमाज भी पढी की उस्से जन्नत नसीब हो, अगर वो मेरी जगह होता तो वो भी जरु वो ही करता जो मेने किया, बस हिम्मत हो पहले अपनो से लडने की.
आज फ़िर से आप की यह रचना पढने को मिली.
धन्यवाद

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जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

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इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

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