जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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05 January 2009

भाई साहब, हैप्पी नियू ईयर टू यू !

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पुरानी पोस्ट है, तो क्या हुआ… 3 जनवरी 2008

हैप्पी न्यू ईयर, सर्र. . . . मैं पलटता हूँ, एक किंचित परिचित चेहरा मेरी तरफ़ मुखातिब मुस्कुराता हुआ दृष्टिगोचर होता है । इनको कहाँ देखा है , दिमाग में चल रहा होता है किंतु ज़ुबान से फिसल पड़ता है, " थैंक यू , सेम टू यू ! "
यहाँ ठहरें कि आगे बढ़ जायें ( न जाने किस वेष में आने वाले कल का कोई  महामहिम ही हो ), मेरे इस असमंजस से उबरने के पहले ही उनका हाथ मेरी तरफ़ को उठता दिखता है । अब रूकना तो लाज़िमी है । ठिठक कर सोच रहा हूँ, किस तरह पेश आया जाये । उन सज्जन की दृष्टि तो सामने के फुटपाथ पर जाती हुई किसी महिला को आँखों ही आँखों मे तौलती हुई सी ' वकोध्यानम एकाग्र ' थी, बाँया हाथ कान से सटे मोबाइल को थामे और दाहिना हाथ जैसे कुछ टटोलती हुई मेरी ओर हवा में लहरा रही थी । अच्छा, लगता तो यह हैंड शेक का न्यौता है ? अशिष्टता न झलके, इस मज़बूरी में ' चलो मिलाय लेते हैं ', मैंने भी हाथ बढ़ा ही दिया ।

सिगरेट दबे होने के कारण वह फ़क़त चार ऊँगलियों से मेरी हथेली को उपर नीचे हिलाते हुए मोबाइल अपने मुँह के सामने ' माइक्रोफोन टेस्टिंग 'के अंदाज़ में ला दहाड़ से रहे हैं, "जल्दि आओ भाई, ईंहाँ डिग्री कलैजिया के सामने दुई घंटे से तुम्हरे इंतजरिया में खड़े हँय । " खट्टाक्क, मोबइलिया बंद, हमारी तरफ़ घूमे, " अउर, बाल बच्चे ठीक ? भाभी जी मज़े में ? आप लोग दिखबै नाँहीं करते हैं । इहाँ एक पार्टी का इंतजार कर रहे थे कि आपै दिखायी दइ गये , नया साल मुबारक़ हो ।"  मुझे भी बोलना ही पड़ता है, " आपको भी "।

सहसा दिमाग में बिज़ली सी कौंधती है, " आप बाजपेयी ठेकेदार हैं न ? " आहाहा हा, हाँ, हाँ । चलो धन्न-भाग हमको, जो आप पहचानै लिये सेवक को । लो, इतने में उनका मोबाइल फिर बीच में कूद पड़ा, पैन्ट की बाँयीं ज़ेब से चीखने लग पड़ा, ' हो रे .. राम, होरे राम, हो रे क्रिश्ना, हो रे राऽऽआम...होऽऽऽ ', और वह मेरी तरफ़ पीठ करके बेचारे मोबाइल का टेंटुआ दबाते हुए फौरन कान से चिपका लेते हैं, ' हलऊ हल्लऊ, हाँ..... ' भाग लो अमर कुमार यही मौका है । एक खिसियाहट से बाहर आने की कोशिश करते हुये, मैं आगे बढ़ लेता हूँ, मन में थोड़ा रंज़ भी है, ' भाभी जी, मज़्ज़े में ? स्साला भाभी के मज़े का ठेकेदार …  ..  हरामी कहीं का ? '

और मेरी वह भी तो ,जिसको देखेंगी मीठी-मीठी मुस्की मार निहाल ही कर देंगी, जैसे एसेम्बली इलेक्सन की उम्मीदवारी मिली हो, बेहया ! हूँह, भाभी जी के मज़े की औलाद कहीं का, स्साला हरामी । ' अब अपनी पूरी बिलागर बिरादरी की पंचायत से दरख़्वास्त है कि, मेरे स्वगत कथन को माइनस करके ज़रा ग़ौर करें कि यह कैसा ' हैप्पी नियू ईयर ' है, और ऎसे रस्मी ' थ्रो अवे गुडविशेज़ ' की कितनी अहमियत है ? चलिये इन बीहड़ बाजपेयी जी को फिलहाल अलग बैठाय देते हैं, लेकिन यह ' नववर्ष की बधाईंयाँ, शुभकामनायें वगैरह वगैरह ' तो जिधर नज़र दौड़ाओ, उधर ही हावी है । यह सब काहे को भाई ?

पच्चीस बवालों के बावज़ूद भी लुटते पिटते 2008 निकाल लाये, इसीलिये 2009 की मुबारक़बाद मिल रही है । मानों तिहाड़ से बाहर आ , अब यरवदा में जारहे हों , सुख शान्ति की ओर...बधाई हो । यह सब मेरी संकुचित समझदानी में नहीं आरहा है तो कैसे खीसें निपोर दूँ ? कोई भाव नहीं, कोई सरोकार नहीं, बस हैप्पी नियू इयर उछाले रहो । यह बधाई तो मुझे की बकरे माँ के ख़ैर मनाने जैसा लगता है, कब तक ? भगवान जाने, शायद जब तक ज़िन्दा रहोगे तब तक । यही सब देते दिलाते दम निकल जाये तो भी यह संतोष तो है कि फलाँ साहब हमारे शुभकामनाओं के चलते ही इतने दिन सकुशल काट लाये । वैसे तो इस रिवाज़ में ज़ाहिराना तौर पर कोई खोट नहीं लउकता । वाज़िब बात, दुनिया की रीत है यह सब ।

सभी हमारे जैसे लंठई सोच के पैदा हो जायें , तो हो गया कल्याण ? लेकिन अगर अब्भी भी हमारा पाइंट नहीं पकड़ पाये हों तो बात खुलासा हो ही जाये । इतना लम्बा चौड़ा ख़ाका सिरिफ़ इस लिये खींचा है, कि शायद कोई लाल बुझ्झकड़ सिरे तक पहुँच ही जाये हम अपनी असभ्य लंठई सोच को गठरिया के बगल रख देते हैं, तो आप पंच लोग यह बतायें कि हम भले अंग्रेज़ी में फिस्सड्डी  होंय, लेकिन परंपरा की कसम खाने को अंग्रेज़ियत का बासी गाउन कब तक सूँघते रहेंगे ? क्या गाँधी का स्वदेशी केवल कपड़ों की होली जलाने भर को ही था, या कि हम कभी अपनी भी कोई सुदेशी सोच कायम कर पायेंगे ? यह भारतदेश है मेरा......। अनेकता में एकता की अद्भुत मिसाल ( भरी सभा में सिगार पीते और  भाषा के गठन पर प्रलाप करते राजेन्द्र याद आरहे हैं ) वाह क्या थ्योरेटिकल बात है ? अब जरा देशी नववर्ष की तिथियों की झलक भी देखें ....
उत्तर भारतीय राज्य - चैत्र शुक्लपक्ष प्रथम
गुजरात - दीपावली के दूसरे दिन, ( जिसे हम परेवा कहते हैं, यानि कामधंधा बंद ) पर वहाँ हर्षोल्लास का दिवस !
पंजाब - बैसाखी के पर्व से
बंगाल - पोइला बोईशाख ( वैशाख शुक्लपक्ष प्रथम )
भारतीय मुस्लिम - मोहर्रम की पहली चाँद के दिन से
दक्षिण भारत – पोंगल

 नववर्ष 2009
यदि मेरे अवलोकन में कोई त्रुटि हो, तो नाचीज़ की इल्मअफ़ज़ाई करने की ज़हमत ग़वारा करें एवं यदि कुछ अतिरिक्त जानकारियाँ साझी करने को है, तो क़िबला मेरे सिर आँखों पर नोश फ़रमायें । ग़र मेरी ख़ुज़ली ख़ारिज़ कर भी दें, पर किससे ग़िला ? यह तो आप देख ही रहे हैं कि अंग्रेज़ियत के नकली शिष्टाचार हमारे महान भारतदेश को एक सूत्र में बाँधे हुये हैं तो फिर मैं ही इसको मुद्दा बनाने पर क्यों आमदा हूँ ? ज़वाब तो भाई मेरे पास भी नहीं है, वरना यहाँ क्यों चिचिया रहा होता ?  फिर भी, मेरे प्रलाप के पीछे कुछ तो है ही ...


चलो भाई, मैं दकियानूस खूसट सही.. पर, आदरणीय शास्त्री जी का सूत्रवाक्य ' हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है ' यहाँ पर मुझे कन्फ़्युजिया देती है ! इसका समाधान कैसे हो ? यह भी माना कि, आधुनिकता के संदर्भ में इतनी अंग्रेज़ियत तो ज़ायज़ है .. सहमत हूँ श्रीमान ! पर.. यह पर, किन्तु, परन्तु जैसे मेरे पीछे पीछे डोला करते हैं ! अंग्रेजी में बोले तो.. चलेंगा, लेकिन 'लेडीज़ फ़र्स्ट' की परंपरा वाली अंग्रेज़ियत की पैरवी करने वाले आख़िर बुकिंग विन्डो पर महिलाओं को धकियाते हुये देखे जाते हैं.. ताज़्ज़ुब नहीं कि, वहीं से पलट कर हाँक लगा दें.. 'मैंने कहा हैप्पी न्यू ईयर, डाक्टर साहब !' तो... तो, मेरे ऊपर क्या बीतती होगी ? यही कि, ऎसी बकवास लिख मारो... और क्या ? जो मेरे मन आया, यहाँ उड़ेंल दिया, ज़रूरी नहीं कि आप सहमत ही हों ! नमस्कार !

4 टिप्पणी:

विनय का कहना है

साहब की कलम और अकल का मिलाप तो ख़ूब है

---यदि समय हो तो पधारें---
चाँद, बादल और शाम पर आपका स्वागत है|

Udan Tashtari का कहना है

चलिये, नहीं कहते उछाल कर कि ’हैप्पी न्यू ईयर’ मगर यह तो पूछ ही सकते हैं कि भाभी जी कैसी हैं? मजे में?? :)

Amit का कहना है

बहुत अच्छा लगा पढ़ कर...

कुश का कहना है

सहमत या असहमत तो कोई तब होगा.. जब तीसरी बार में उसको पोस्ट समझ आएगी.. हम तो खैर किसी तरह गिरते पड़ते दूसरी बार में समझ गये की आप क्या कहना चाहते है.. पर करे क्या ग्लोबल जमाना है.. और बचपन से सुनते आ रहे है की जमाने के साथ चलो.. तो बस सब जमाने के साथ चल रहे है.. शायद इसी को बड़े बुज़ुर्गो ने भेड चाल कहा होगा.. बेचारी भे डे बुरा मान गयी होगी..

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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