जो इन्सानों पर गुज़रती है ज़िन्दगी के इन्तिख़ाबों में / पढ़ पाने की कोशिश जो नहीं लिक्खा चँद किताबों में / दर्ज़ हुआ करें अल्फ़ाज़ इन पन्नों पर खौफ़नाक सही / इन शातिर फ़रेब के रवायतों का  बोलबाला सही / आओ, चले चलो जहाँ तक रोशनी मालूम होती है ! चलो, चले चलो जहाँ तक..

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12 February 2008

य़े कैसा दीवानापन है....

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या फिर दिवालियापन है ?
मैं
समझूँ .. ना समझूँ , तू समझ ले ज़रूर....... .. यह कैसा दिवालियापन है...ऽ...ऽ ?सच्चि मा हमरे इलेक्ट्रानिक मीडिया को ई हुई का गवा है ? चलत रहे चलत रहे 24 घंटे चलत रहे, ई चलावै की मज़बूरी कउनौ ब्रह्मा तो लिक्खिस नहिं न , तौ घड़ि दुई घड़ि रेस्ट ले लियो ! ई कचरा काहे पड़ोसत हो भाई , अँय ? हिंदुस्तान भरे मा हर घड़ि, हज़्ज़ारन मनई गुजर जात है , अउर सैकड़न बिरेकिंग नियूज़ मिलिहें , तनिक आपन नज़र तो दउड़ाओ ! अइसा ब्रेकिंग न्यूज़ दइ दिहो के, अब हमरी मेहरिया खानौ न बनाई अउर हम खाब का ?

2 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi का कहना है

अमर भैया हम तो टीभी न्यूज देखबो छोड़ दीन्ह। अउर महरिया खानो न बनाई तो हमरी छपरिया में आ जाई। हमरी महरिया रोज एक मानुस भोजन कराइब ढूंढत रही।

डा० अमर कुमार का कहना है

धन्यवाद द्विवेदी जी,
हमको मानुस समझने के लिये !
पहले मेगास्टार का ज़ुकाम ठीक होने की
ख़बर तो आ जाय, भोजन पानी बाद में देखेंगे ।

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?

जरा साथ तो दीजिये । हम सब के लिये ही तो लिखा गया..
मैं एक क़तरा ही सही, मेरा वज़ूद तो है ।
हुआ करे ग़र, समुंदर मेरी तलाश में है ॥

Comment in any Indian Language even in English..
इन पोस्ट को चाक करती धारदार नुक़्तों का भी ख़ैरम कदम !!

Please avoid Roman Hindi, it hurts !
मातृभाषा की वाज़िब पोशाक देवनागरी है

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यह अपना हिन्दी ब्लागजगत, जहाँ थोड़ा बहुत आपसी विवाद चलता ही है, बुद्धिजीवियों का वैचारिक मतभेद !

शुक्र है कि, सैद्धान्तिक सहमति अविष्कृत हो जाते हैं, और यह ज़्यादा नहीं टिकता, छोड़िये यह सब, आगे बढ़ते रहिये !

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